5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अर्ध स्वायत्तता प्रदान करने वाली संविधान की धारा 370 को निरस्त कर दिया। जिसके बाद, कश्मीरियों पर ज़ुल्म और अत्याचारों का मानो कभी नहीं ख़त्म होने वाला एक सिलसिला शुरू हो गया, जिसके तहत हज़ारों कश्मीरी युवाओं को गिरफ़्तार करके भारत के विभिन्न इलाक़ों की जेलों में बंद कर दिया गया और दुनिया के इतिहास में अब तक का सबसे लम्बा कर्फ़्यू और लॉकडाउन लागू किया गया और इंटरनेट और टेलीफ़ोन सेवाएं बंद कर दी गईं।
धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को अपना संविधान और अलग झंडा रखने की आज़ादी हासिल थी। ग़ैर कश्मीरी भारतीय नागरिकों को वहां ज़मीन ख़रीदने की अनुमति नहीं थी। मोदी सरकार ने इसे निरस्त करते हुए दावा किया था कि इसके बाद, कश्मीर में शांति बहाल होगी और ख़ुशहाली आएगी।
लेकिन पिछले एक साल के दौरान, कश्मीरियों ने हिंसा, अत्याचार, क़ैद, ख़ून, पीड़ितों की चीख़-पुकार और भारतीय सुरक्षा बलों के बूटों की आवाज़ों के अवाला कुछ नहीं देखा और सुना। यहां तक कि कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप के दौरान, जब संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक युद्ध विराम की अपील की, मोदी सरकार ने कश्मीर में अपना एजेंडा तेज़ कर दिया और इस क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक ताने-बाने को नष्ट करने के लिए प्रयास तेज़ कर दिए।
एक साल बीत जाने के बाद भी दो दर्जन से अधिक कश्मीरी नेताओं समेत हज़ारों कश्मीरी युवक, दर्जनों कार्यकर्ता और पत्रकार जेलों में बंद हैं।
हालांकि यह सब कश्मीरियों के लिए कोई नई बात नहीं है। 1947 में भारत की आज़ादी और पाकिस्तान के अलग मुल्क बनने के बाद से उन्हें इसी तरह के हालात का सामना रहा है। भारत पाकिस्तान पर कश्मीरी चरमपंथियो के समर्थन और आतंकवादियों की घुसपैठ का आरोप लगाता रहा है। दोनों देश कश्मीर को लेकर दो युद्ध भी लड़ चुके हैं।
दशकों से भारतीय सुरक्षा बलों और कश्मीरी विद्रोहियों के बीच संघर्ष जारी है, जिससे सबसे ज़्यादा आम नागरिक पीड़ित हो रहे हैं। भारतीय सुरक्षा बल युवाओं को उनके घरों से उठाकर ले जाते हैं, उन्हें यातनाएं दी जाती हैं, महिलाओं का बलात्कार किया जाता है और विरोध प्रदर्शनों बहुत ही क्रूरता से कुचला जाता है। 1990 से मार्च 2017 तक कश्मीर में कम से कम 41,000 लोग मौत के घाट उतार दिए गए।
इस साल, अब तक भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों 143 कश्मीरी युवक मारे जा चुके हैं, केवल जून में मरने वालों की संख्या 62 थी। भारतीय सुरक्षा बलों का आरोप है कि यह लोग चरमपंथी थे और मुठभेड़ के दौरान यह मौतें हुई हैं। 26 जून को भारतीय सुरक्षा बलों और सशस्त्र विद्रोहियों के फ़ायरिंग में एक 5 साल का बच्चा भी सुरक्षा बलों की गोली का निशाना बन गया। पहली जुलाई को भारतीय सुरक्षा बलों की गोली से एक 65 वर्षीय व्यक्ति की भी मौत हो गई।
इस दौरान कश्मीरी अवाम को कोविड-19 और भारतीय सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। सैकड़ों लोग बेघर हो गए हैं, क्योंकि उनके घरों को सुरक्षा बलों ने ध्वस्त कर दिया। केवल मई के महीने में 22 घरों को तोड़ा गया।
कहा जा रहा है कि भारतीय सुरक्षा बल एक रणनीति के तहत घरों को ध्वस्त कर रहे हैं और युवाओं का अपहरण कर रहे हैं। यह वह रणनीति है, जो उन्होंने ज़ायोनी सेना से सीखी है, ज़ायोनी शासन जिसका इस्तेमाल फ़िलिस्तीनी नागरिकों के ख़िलाफ़ करता रहा है।
जम्मू-कश्मीर में 70 प्रतिशत युवा बेरोज़गार हैं। इसके अलावा, लगातार हिंसा ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डाला है। मेडेसिन्स सैंस फ्रंटियर्स के अनुसार, लगभग 18 लाख वयस्कों या 45 प्रतिशत आबादी ने मानसिक प्रताड़ना का अनुभव किया है, और 70 प्रतिशत लोगों ने एक न एक हिंसक मौत देखी है।
मई में हुई हिंसा ने कश्मीरी युवाओं के लिए और भी अधिक अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। 22 वर्षीय ऑटो मैकेनिक आदिल बशीर उस दिन को अपने जीवन का सबसे मनहूस दिन बताते हुए कहते हैं कि कुछ ही लमहों में उनकी सारी जमा पूंजी राख हो गई। एक जगह जहां मैंने अपने जीवन के 22 साल बिताए हैं, अब वह वैसी नहीं रही। सब कुछ जलकर राख हो गया। मेरे पास कुल जमा पूंजी के 1 लाख 30 हज़ार रुपये थे, जो मैंने अपने घर की छत को ठीक करने के लिए जमा किए थे, लेकिन अब उनके पास न वह पैसे हैं और न ही रहने के लिए कोई घर।
बशीर के भतीजे 12वीं क्लास के छात्र मोहम्मद इब्राहीम को भारतीय सुरक्षा बलों ने घर की तलाशी के दौरान बुरी तरह से मारा पीटा और बाद में घर को ध्वस्त करने के लिए उसे आग के हवाले कर दिया। इब्राहीम का कहना था कि जो कपड़े मेरे तन पर हैं और जो जूते पैरों में हैं, इसके अलावा कुछ नहीं बचा, सबकुछ जलकर राख हो गया।
पिछले एक साल के दौरान, मोदी सरकार ने कश्मीर के लिए कई नए क़ानून पारित किए हैं, जैसे की ग़ैर-कश्मीरियों को संपत्ती ख़रीदने और नौकरी हासिल करने का अधिकार। सरकार पहले ही 25,000 कश्मीरियों को स्थायी निवास प्रमाण पत्र जारी कर कुची है।
मोदी सरकार पर आरोप है कि वह मुस्लिम बहुल राज्य की आबादी के अनुपात को बदलने का प्रयास कर रही है। मीडिया की आवाज़ को सख्ती से दबाया जा है। पत्रकारों को नियमित रूप से परेशान किया जा रहा है और उन्हें सरकारी एजेंसियां और बल डरा धमका रहे हैं। उनके ख़िलाफ़ सख़्त धाराओं में मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं। इस प्रकार, नई दिल्ली ने अपनी डराने और धमकाने की रणनीति से विरोध की आवाज़ को दबा दिया है, लेकिन ऐसा करके उसने कश्मीरियों को पहले से कहीं अधिक भारत से दूर कर दिया है।